ध्यान सागर की तरह है
जो गंदी नदियों को ग्रहण करता है और फिर भी शुद्ध रहता है।
तुम्हें उसके पहले शुद्ध होने की आवश्यकता नहीं।
परंतु तुम उसमें से शुद्ध होकर निकलोगे।
ध्यान बेशर्त है।
पवित्रता उसकी प्रथम अनिवार्यता नहीं—बल्कि परिणाम है।
--
-
जो गंदी नदियों को ग्रहण करता है और फिर भी शुद्ध रहता है।
तुम्हें उसके पहले शुद्ध होने की आवश्यकता नहीं।
परंतु तुम उसमें से शुद्ध होकर निकलोगे।
ध्यान बेशर्त है।
पवित्रता उसकी प्रथम अनिवार्यता नहीं—बल्कि परिणाम है।
--
-
No comments:
Post a Comment