Saturday, November 30, 2024

नर्मदा मञ्जरी

 शोभती थी लता कल्पवल्ली बड़ी

स्वर्ग में देवता साधते स्वार्थ थे।

मानवों ने विचारा सभी लाभ लें

दिव्य भू क्या न होगी हमरी मही?।।१।‌


की तभी शम्भुकी शुद्ध आराधना

तो लता क्या सुधा धाम भी सोमका।

हो द्रवीभूत सारा धरा पै बहा

नाम रेवा उसी का हुआ नर्मदा।।२।।


कामना पूर्ण हो कल्प की छांह में

जो सुना था उसे आज देखें सभी।

घाटमें वाटमें ग्राममें धाम में

नर्मदा की तरंगें उमंगें भरें।।३।।


जीवको जो हुई कल्पनाएं यहां

वे फलीं फूलतीं भासतीं मंजुला।

कीर्ति फैली भली लेखिनी भी चली

लोज में लोकते नर्मदामञ्जरी।।४।।


गारहे गीत ग्रामीण बन्धु ही क्यों

वे कवी क्रान्तदर्शी सुधी भी सभी।

गारहे भावभीनें स्वरों में सही

नर्मदामनब्जरी नर्मदामञ्जरी।।५।।


मञ्जरी मञ्जुरी तूं हिए में बसी

मोहती आ रही शुभ्र आलोक में ।

है भली सर्वदा-सर्वदा जीवको

दे रही भव्यता मां निजी धाम की।।६।।

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