Monday, November 9, 2015

तू जाता कहां है?



व्योम पर छाया हुआ तम तोम, हे हिम हंस,
तू जाता कहां है?
नील-नीलम नभ निमंत्रण दे किसी को
तो करे इनकार कैसे
आंख जिनके, हो न उनको चांद-सूरज
की किरण से प्यार कैसे
ठीक है, दिल पास रखता हूं, समझता
हूं सभी कुछ, आज लेकिन,
व्योम पर छाया हुआ तम तोम, हे हिम हंस,
तू जाता कहां है?
आसमानी स्वप्न ललचाते उसे हैं
भूमि जिसकी जन्म-गोदी,
आग से खिलवाड़ करने को तरसता
ही सदा है जल-विनोदी,
और फिर डैने मिले, इनको थका आ,
तोड़ आ, चाहे जला आ,
बे दिये कीमत यहां
वरदान कोई मुफ्त में पाता कहां है?
व्योम पर छाया हुआ तम तोम, हे हिम हंस,
तू जाता कहां है?
है ठहर तब तक फलक पर
जब तलक है
जोर बाजू का सलामत,
बिजलियों की हर लहर, जैसे जमीं की
ओर गिरने की अलामत,
दग्ध पर की, दग्ध स्वर की कद्र केवल
एक धरती जानती है,
लाख आकर्षित किसी को भी करे आकाश
अपनाता कहां है?
व्योम पर छाया हुआ तम तोम, हे हिम हंस,
तू जाता कहां है?
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हम जमीन पर जन्में हैं, आकाश का निमंत्रण और चुनौती हमें मिलती है। हम वही तो पाना चाहते हैं जो हम नहीं हैं। यही तो सारा संसार है—हम वही तो पाना चाहते हैं जो हम नहीं हैं। और हम पा केवल वही सकते हैं जो हम हैं। यही तो उपद्रव है। यही तो सारा गणित है। जो हमारा नहीं है, उसे हम पाना चाहते हैं। और उसे हम कभी पा न सकेंगे। जो हमारा है, वह मिला ही हुआ है। उसे पाने की कोई जरूरत नहीं है। मगर जो हमारा नहीं है, उसे पाने की आकांक्षा है अभी, उसके पीछे दौड़ना होगा, दौड़ना होगा और गिरना होगा, फिर उठना होगा और दौड़ना होगा। दौड़-दौड़ कर गिरना होगा। हर बार आशा करनी होगी, हर बार विषाद से भरना होगा। बहुत बार चोट खा-खा कर एक दिन यह बोध जागेगा—चोट पर चोट, चोट पर चोट— एक दिन यह बोध पैदा होगा, तुम्हारे भीतर, कि जो मेरा नहीं है, वह मेरा कभी नहीं हो सकेगा। वह हो ही नहीं सकता। वह प्रकृति का नियम नहीं है। तो अब मैं उसकी तरफ मुड़ूं जो मेरा है। उसी दिन अंतर्यात्रा शुरू होती है।
उसी दिन संन्यास।
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