Thursday, February 25, 2016

व्यंग—मच्छर मांगे आजादी!!!

मैं शांति से बैठा अखबार पढ़ रहा था, तभी कुछ मच्छरों ने आकर मेरा खून चूसना शुरू कर दिया। स्वाभाविक प्रतिक्रिया में मेरा हाथ उठा—चटाक!! दो-एक ढेर हो गये!! फिर क्या था, शोर मचने लगा-कि मैं असहिष्णु हो गया हूं! मैने कहा कि यदि तुम खून चूसोगे तो मैं मारूंगा। इसमें असहिष्णुता कहां से आगयी? उन्होने कहा—खून चूसना उनका अधिकार है। उसकी आजादी उन्हें चाहिये।

"आजादी " शब्द सुनते ही कई बुद्धिजीवी उनके पक्ष में उतर आए और बहस आगे बढ़ने लगी---
और नारेबाजी होने लगी—"कितने मच्छर मारोगे? हर घर से मच्छर निकलेगा!!!"
बुद्धिजीवियों ने अखबारों में अपने बड़े-बड़े तपते लेख लिखना शुरू कर दिया----
उनका कहना था, मच्छर देह पर बैठे जरूर थे लेकिन इससे यह कहां सिद्ध होता है कि वे खून ही चूस रहे थे? और अगर चूस भी रहे थे तो यह देह-द्रोह की श्रेणी में नहीं आता। ये बड़े ही प्रगतिशील बच्चे थे! देह पर बैठना इनका प्रिय शुगल हुआ करता था।

मैंने कहा—मैं अपना खून नहीं चूसने दूंगा। बस।
वे कहने लगे, यह 'एक्सट्रीम देह-प्रेम' है! तुम कट्टरपंथी हो डिबेट से भाग रहे हो।
मैंने कहा तुम्हारा उदारवाद तुम्हें मेरा खून चूसने की इजाजत नहीं दे सकता।
इस पर उनका तर्क था कि भले ही यह गलत हो पर थोड़ा खून चूस लेने से तुम्हारी मौत तो नहीं हो जाती? लेकिन तुमने मासूम बच्चों की जिंदगी छीन ली! 'फेअर ट्रायल' का मौका भी नहीं दिया!

इतने में कुछ और बड़े नेता आ गये और वो उन मच्छरों को अपने बगीचे की बहार का बेटा बताने लगे!!

हालात से हैरान और परेशान होकर मैंने कहा कि ऐसे ही मच्छरों को खून चूसने देने से मलेरिया हो जाता है, और तुरंत न सही बाद में बीमार व कमजोर होकर मौत भी हो सकती है। इस पर वे कहने लगे कि तुम्हारे पास तर्क नहीं है, इसलिये तुम भविष्य की कल्पना के आधार पर अपने फासीवादी फैसले को ठीक ठहरा रहे हो।

मैंने कहा कि यह साइंटिफिक तथ्य है कि मच्छरों के काटने से मलेरिया होता है। मुझे, इससे पहले अतीत में भी यह सब झेलना पड़ा है। पर इसमें छुपा गहरा विज्ञान उन्हें समझ नहीं आया। जबाब में वे कहने लगे कि मैं, मच्छर समाज के प्रति इतिहास को, अपनी घृणा का बहाना बना रहा हूं, जबकि मुझे वर्तमान में जीना चाहिये।

इतने हंगामे के बाद उन्होंने मेरे ही सिर माहौल बिगाड़ने का आरोप भी मढ़ दिया। मेरे खिलाफ, मेरे ही कान में घुसकर सारे मच्छर भिनभिनाने लगे—'लेके रहेंगे आजादी!'

मैं बहस और विवाद में पड़कर परेशान हो गया था, उससे कहीं ज्यादा जितना खून चूसे जाने से हुआ था।

आखिर मुझे तुलसी बाबा याद आये—
"सठ संग विनय, कुटिल संग प्रीति...।'

और फिर मैंने काला हिट उठाया, और मंडली से मार्च तक बगीचे से नाले तक उनके हर साफिस्टिकेटेड और सीक्रेट ठिकाने पर दे मारा।

एक बार तेजी से भिन्न-भिन्न हुई और फिर सब शांत!!!
----
--
-
.




No comments:

Post a Comment