हमें यह भ्रांति है कि हम अपने जीवन के नियंता हैं। हमें लगता है कि हम न सम्भालेंगे तो कौन सम्भालेगा!
और बड़ा मजा है कि क्या सम्भाल रहे हो तुम? जन्म हुआ तुम्हारा, यह तुमने तय किया था? फिर तुमने श्वांस लेनी शुरू कर दी, यह तुमने ली थी? फिर एक दिन श्वांस बंद हो जायेगी, तुम लेना भी चाहो तो न ले सकोगे।
.
मुल्ला नसीरुद्दीन से कोई पूछ रहा था कि आपकी ज्यादा लम्बी उम्र का क्या राज है?
मुल्ला ने कहा: कुछ नहीं। सांस लेते रहना। बस सांस बंद मत करना। कुछ भी हो जाए, सांस लेते रहना।
.
मगर कैसे लोगे सांस? मौत आयेगी तब जो सांस बाहर गयी, नहीं लौटेगी, तब?
अपनी सांस पर भी तो हक नहीं है, और किस बात पर हक होगा?
.
लेकिन हमें भ्रांति है कि हम नियंता हैं: अगर हमने अपनी व्यवस्था न की तो सब बिखर जायेगा। तुम्हारी व्यवस्था के कारण बिखर रहा है। तुम कृपा करो और व्यवस्था से हट जाओ। और तुम कह दो उसी को कि तू संभाल! जहां बैठायेगा, बैठ जायेंगे। जैसी तेरी मर्जी। तेरी मर्जी से हम राजी हैं।
.
ऐसा कहते ही तुम अचानक पाओगे, सब व्यवस्था बैठने लगी। तुम नाहक ही बोझ लिये चल रहे हो। बोझ उस पर छोड़ दो। तुम निर्भार हो सकते हो।
.
सार यही है कि निर्भार हो जाओ तो तुम्हारे जीवन में मस्ती आ जाए। 'भजन भाव में मस्त डोलती!'--अब रही नहीं कोई चिंता। व्यवस्था न रही, नियंता न रहे--तो चिंता न रही। और तभी 'भजन भाव में मस्त डोलती, गिरधर पे बलि जाए।'
.
और यही मार्ग है--अपने असली घर तक पहुंचने का।
.
मैं तो गिरधर के घर जाऊं।
गिरधर म्हारो सांचो प्रीतम, देखत रूप लुभाऊं।
रैन पड़ै तब ही उठि जाऊं, भोर भये उठि आऊं।
रैन दिना बाके संग खेलूं, ज्यूं-ज्यूं वाहि रिझाऊं।
जो पहिरावै सोई पहरूं, जो दे सोई खाऊं।
मेरी-उनकी प्रीत पुराणी, उन बिन पल न रहाऊं।
जहां बिठावै तित ही बैठूं, बेचैं तो बिक जाऊं।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, बार-बार बलि जाऊं।
मैं तो गिरधर के घर जाऊं!
----------
----------