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पहली तो बात, भक्ति का शास्त्र सम्भव नहीं है; फिर भी शस्त्र बनाना पड़ा है। बहुत सी बातें सम्भव नहीं हैं; फिर भी करनी पड़ती हैं। जैसे परमात्मा को नहीं कहा जा सकता, फिर भी कहना पड़ता है। कोई कहने क उपाय नहीं है। जो भी हम कहेगे गलत होगा। कहा नहीं, कहते ही गलत हो जायेगा।
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