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बिना साधु संगति के लोकलाज कहां खोओगे? बिना साधु-संगति के तुम्हारी जड़ परंपराएँ, लकीरें, लीकें कैसे मिटेंगी? बिना साधु-संगति के कैसे तुम कह सकोगे; 'छांड़ दई कुल की कानि, कहा करिहै कोई!'
साधु के पास बैठने का अर्थ है कि वह खबर लाएगा तुम्हारे पिंजरों में-- खुले आकाश की। वह जंजीरों से मुक्त होने का उपाय बताएगा। साधु का अर्थ है कि तुम्हारे भीतर परमात्मा को पाने की प्यास को प्रज्जवलित करेगा।
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भक्त करते क्या हैं। साधु करते क्या हैं? यह मीरा क्यों भगत देख राजी हुई? वहां होता क्या है? पारस की तरह साधु को छूने से तुम भी साधु होने लगते हो। वहां एक रूपांतरण हो रहा है।
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जिससे हिल जाएँ अर्श के पाए
अपने उस दर्द-ओ-गम की बात करो।
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वहां परमात्मा के विरह की पीड़ा की चर्चा होती है।
'जिससे हिल जाएँ अर्श के पाए।' आकाश के भीतर अगर कोई कहीं पाए हों तो हिल जाएँ, ऐसी बिरह की पीड़ा की बात होती है। अपने उस दर्द-ओ-गम की बात करो जो रुला दे तमाम आलम को बस उसी चश्मे-नम की बात करो।
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