Sunday, November 30, 2014

"परम जीवन का सूत्र"

जब पहली दफा यूरी गागारिन अन्तरिक्ष में गया तो आशा कर रहे थे, उसके देशवासी कि वह वहां से, अन्तरिक्ष से संदेश भेजेगा, चिल्लाएगा,  सोवियत रूस की जय, कुछ कहेगा, लेकिन जो पहला शब्द यूरी गागारिन के मुंह से निकला, वह समझने जैसा है। वह योग का बहुत पुराना अनुभव है किसी और आकाश में उठने का। युरी गागारिन के मुंह से नहीं निकला 'माई रशा', उसके मुंह से निकला 'माई-वर्ल्ड', 'माई-अर्थ'। उस ऊंचाई पर देखने से कोई देश नहीं रह गया। उस ऊंचाई से देखने में पूरी जमीन एक हो गयी, सारी दुनियां एक हो गयी। उसके मुंह से निकला, मेरी पॄथ्वी! मेरी दुनिया!

ऐसे ही भीतर के आकाश में कोई जाता है तो वहां 'मैं' और 'तू' की सीमाएं खो जाती हैं। वे भी मनुष्य की कामचलाऊ, एक नक्शे पर खींची गयी सीमाएं हैं। लेकिन ये झूठ एक सीमा तक ही चलेंगे। जमीन पर ही चलना हो, हारीजांटल चलना हो तो रूस और हिंदुस्तान और पाकिस्तान चलेंगे, लेकिन वर्टिकल उड़ान लेनी हो, आकाश में उठना हो तो रूस, हिन्दुस्तान खो जायेंगे। जिसको भीतर के आकाश में ऊपर उठना हो उसे 'मैं' और 'तू' सब खो जायेंगे और जब 'मैं' और 'तू' खो जाते हैं तो शेष रह जाता है, दी रिमेनिंग, वह जो बच रहता है, वही परमात्मा है।
योग का एक सूत्र और है--मृत्यु भी ऊर्जा है। 'death is too energy!' जीवन ही ऊर्जा है, ऐसा नहीं है, मृत्यु भी ऊर्जा है। जीवन ही जीवन है, ऐसा नहीं है, मृत्यु भी जीवन है।और जीवन ही चाहने योग्य है, ऐसा नहीं, मृत्यु भी बहुत प्यारी है। और जो मृत्यु के लिये राजी नहीं, वह जीवन से वंचित रह जायेगा। और जो मृत्यु के लिए राजी है, वह परम जीवन का अधिकारी हो जायेगा।
मृत्यु भी ऊर्जा है, मृत्यु भी परमात्मा है, मृत्यु भी प्रभु है। यह योग का परम सूत्र है। अंतिम सूत्र है। जो मृत्यु को भी जीवन की तरह देख पायेगा, है ही, सिर्फ देखने की बात है। जिस दिन पता चलेगा, 'मैं' नहीं हूं, उसी दिन पता चलेगा, मृत्यु किसकी? मृत्यु कैसी? कौन मरेगा? कौन मर सकता है? लोग जब तक कहते हैं कि मैं नहीं मरुंगा, मैं अमर हूं, मेरी आत्मा अमर है, तब तक समझना कि सब बातचीत सुनी-सुनाई है। जब कोई कहे कि मैं नहीं हूं, और जो है वह अमृत है तब समझना कि कोई बात हुई। मैं तो अमर होना चाहता हूं, लेकिन मैं हूं ही नहीं। और जो अमर है उसका हमें पता ही नहीं।
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...........(संकलित)











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