Tuesday, July 8, 2014

*मधु का प्याला*

कभी-कभी तो,
एक हवा का शीतल झौंका,
किसी सुबह तो,
तुम्हें जगाता होगा?

और चांद की शीतल किरणें,
कभी-कभी तो---लोरी गाकर,
तुम्हें सुलाती होंगी!

घोर निशा के निविड़ तिमिर में,
टिमटिम तारे---
कभी देख तो पाते होगे...

प्रिय की मुस्कानों का जादू
कभी हृदय पर चलता तो होगा?

मेरे देखे, आज कहूं मैं,
वहीं कहीं पर राज छुपा है---
वहीं कहीं पर होश छिपा है---
बाकी तो सब बेहोशी है।

बुद्धि के प्रपंच निराले,
ज्ञानी भटके, मूरख पहुंचे ...
पी-पी कर मधु का प्याला...

जब दिल से कोई हूक उठे-या
उस पर कोई ठोकर आए,
बुद्धि सिमट कर एक तरफ जब
दूर खड़ी हो जाए...

तभी जागना
नहीं चूकना तब यदि
छलके मधु का प्याला
हो जाना पी-पी कर मतवाला।
...
(dada64)

Friday, July 4, 2014

"तुम खुद मेरी गजल बनो"

मेरी कविता का अर्थ न पूछो,
उसमें अर्थ कहां है?
मेरे गीतों के बोल अनूठे!
उनमें व्यर्थ न उलझो।

मेरी कविता के साथ बहो,
और मेरे गीतों में झूमो।
हो साहस तो करो नृत्य,
अपने आपा को भूलो।

मेरी गजलें तो दीवानी हैं,
इनमें क्या हासिल है?
न मानो तो मेरी गजलों के,
दीवानों से पूछो

कहां-कहां तुम गागर लेकर,
जल भरने को घूमे!
पर रीती ही रही हमेशा,
जब देखी आकर के घर में!

कितनी क्रांति हुई है जग में!
कितने राज्य बने मिटे हैं!
उनका कोई अर्थ बताओ?
आखिर सब वे दफनाई हुई,
स्मृतियाँ हैं।

तुम संजीदे लोग गजब हो,
दीवानों की हंसी उड़ाते,
खुद रोते दुख सहते,
साथ कभी कुछ क्या ले जा पाते?

बुद्धि की घानी में अब तक,
कितना क्या कुछ पेर चुके हो?
किन्तु लगा क्या हाथ अभी तक,
अनजाने का विस्तार कहां तक?

छोड़ो दिमाग की बात,
यहां तो बात करो तुम दिल की,
मेरी कविता के साथ बहो,
और मेरे गीतों में झूमो

तुम खुद मेरी गजल बनो,
उसका अर्थ न पूछो।

...(dada64)

Thursday, July 3, 2014

॥योगी॥

भरे बाजार, जिसका-
ध्यान सधने लगे,
योगी वही है।

जिंदगी की कशमकस के बीच,
चित्त को विदीर्ण करती,
संसारी अहंकारी गर्जनाएं,
उद्वेगों का फेनिल विकार,
बहता उफनता गंदगी के रूप में,
लगता किनारे--आखरी परिणामों सा।

संसार के तूफान में जो,
होश कायम रख सके,
योगी वही है।

जब कभी,
निर्जन हिमालय से उतर,
आओगे नीचे,
संसारी हवाओं के थपेड़े,
भंग कर देंगे, हिमानी शांति को।

अस्तित्वगत जिंदगी यदि है, तो--
सब कहीं है, एक सी है।
चाहे हों हिमालय की निर्जन गुफाएं,
या तुम्हारे शहर का व्यस्त बाज़ार।

जागरण पर--जब अहं,
स्वप्नवत् निर्मूल्य होगा,
चित्त की झील, तब दर्पण बनेगी,
तब अखण्डित चांद को तुम देख लोगे।

बरसती चांदनी!
फैलता अमरत्व!
झूमते वृक्ष!
प्रकृति में चल रहे,
इस अखण्ड उत्सव से,
तुम कभी भी,
जुदा नहीं हो।
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(dada64)

'राजनेता' का स्वर्गारोहण!!!

एक बार हुआ ऐसा कि,
एक राजनेता--दिल्ली का,
मरा।
होशियार था,
दुनियादारी के दावपेंच जानता था।
सारी उम्र दिल्ली में गुजारी थी।
घेराव, आंदोलन, सभाएं, टकराहट!
उत्तेजना की लकीरें,
मरने के बाद भी शेष थी।

स्वर्ग या नर्क?
कहां जाना है?
पूछा ईश्वर ने-
नेता बोला--
पहले सैर करवा दो,
जहां मन लग जाएगा, वहीं रह जायेंगे

पहले
स्वर्ग के द्वारपाल को,
नेता जी का गाइड बनाया।

स्वर्ग!!!
सब ध्यानस्थ!
न कोई शोर न कोई उपद्रव,
स्वर्ग की शांति, नेता को
मरघटी सन्नाटे सी चुभी
नेता घबराया
अकबका के द्वारपाल से पूछा--
यहां अखबार निकलते हैं?
विनम्र उत्तर मिला--
जरूरत ही नहीं।
न कोई झगड़ा, न झांसा,
न कोई चोरी, न तमाशा,
न पराई स्त्री को भगा ले जाने का अंदेशा,
मतलब--
यहां छापने की कोई खबर ही नहीं!

राजनेता सकपकाया,
और झपट के, नर्क की ओर कदम बढ़ाया।

नर्क अधिपति शैतान,
स्वयं द्वार तक लेने आया।
पुष्पमाल से स्वागत हुआ।
पश्चात
मदिरा के दौर चले
आक्रेस्टा पर सुंदर बालाओं के नृत्य!!!
नेता को स्वर्ग से लगे!
जैसे नर्क में स्वर्ग का अनुभव हुआ।

नेता ने झूम कर कहा---
माइक लाओ, सभा करो--
पंडित पुरोहितों को बेनकाब करूंगा
इनके बहकावे में लोग भ्रमित हैं।
स्वर्ग को नर्क
और नर्क को स्वर्ग, समझ रहे हैं।
जबकि हालात एकदम उल्टे हैं।

लम्बी नि: श्वांस लेकर शैतान बोला--
क्या करें?
सदियों से,
सारे प्रचार माध्यम, परमात्मा के कब्जे में हैं।
विज्ञापन का जमाना है!
झूठ भी सच हो जाता है।

राजनेता ने साहस बंधाया--
और अपना ठिकाना नर्क ही बनाया।
स्वर्ग के द्वारपाल को बेमुरौवत,
वापिस लौटाया।

द्वारपाल के मुड़ते ही,
और
नर्क का द्वार बंद होते ही,
दृश्य बदल गए--
उत्तप्त बड़े-बड़े कढ़ाहों से
गोस्त के जलने की गंध,
और
कष्टों की पराकाष्ठा से उठते आर्तनादों,
के बीच उभरते, नरकंकालों के अट्टहासों से,
राजनेता कंप गया।
अवरुद्ध कंठ,
बमुश्किल पूछा--
क्या हुआ?
अभी तक तो सब ठीक था?

स्पष्टीकरण ऐसा मिला--
कि वह सब तो टूरिस्टों के लिए था।
क्योंकि,
हर दुख के पेकेट पर,
सुख का लेवल, तो
लगाना ही पड़ता है।
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...(dada64)

Wednesday, July 2, 2014

'मौन' पर भाषण??

मेरे प्रिय विद्यार्थी,
मुगालते में मत रहना
शिक्षा की परिभाषा-
हर युग में परिशोधित हुई है-
आज की शिक्षा!
छल, फरेब, धोखा, ईष्या, वैमनस्यता,
प्रताड़ना, शोषण, तनाव, कटुता
की कड़ुआहट को,
मीठी और सुंदर भाषा के केप्सूल में
रखके दूसरों का उपचार कर लेने में,
निपुणता का नाम है

हर व्यक्ति आतुर है आज
सुनाने को दास्तां अपनी
निपुणता की।

जानकर खुशी हुई कि
समय नहीं है
तुम्हें भी
किसी को सुनने का
भीड़ बेताब है
कान के पर्दे फट जांय, इतना शोरगुल है!
पर अब
सुनने वाले पैदा ही नहीं हो रहे हैं।
संसद सा दृश्य तो अब-
तुम्हारे मुहल्ले में भी होगा?

मौन होना तो अच्छी बात है
मैं भी मानता हूं।
पर उसमें खतरा भी है-
आसपास का शोरगुल
एक साथ सुनाई देने लगता है।
कान खराब हो जाने का भय भी है।
पर हां!
इस संसदीय संस्कृति के युग में
"मौन पर भाषण"
मुझसे अधिक अच्छा कौन दे सकता है?
'मौन' मेरा सब्जेक्ट रहा है,
उस पर मैं अथारिटी हूं।
तुम्हें कभी अवकाश मिले तो-
मेरी तरफ निकल आना।

...(dada64)

॥पड़ाव॥

बीत गयी बातों में,
रात वह खयालों की।
हाथ लगी निंदयारी जिंदगी!

आंसू था सिर्फ एक बूंद
मगर जाने क्यों,
भीग गयी है, सारी जिंदगी?

वह भी क्या दिन था!
जब सागर की लहरों ने,
घाट बंधी नावों की
पीठ थपथपाई थी!

जाने क्या जादू था?
मेरे मनुहारों में!
कि
चांदनी
लजाकर इन बांहों में सिमट आई थी!

अब तो गुलदस्ते में,
बाकी कुछ फूल बचे,
और बची रतनारी जिंदगी।

मन के आइने में,
उगते जो चेहरे हैं
हर चेहरे में
उदास हिरनी की आंखें हैं।

आंगन से सरहद को जाती,
पगडंडी की दूबों पर
बिखरी कुछ बगुले की पांखें हैं।
अब तो हर रोज
हादसे?
गुमसुम सुनती है
अपनी यह गांधारी जिंदगी!

जाने क्या हुआ?
नदी पर कोहरे मंडराए
मूक हुई सांकल और
दीवार हुई बहरी है।

बौरों पर पहरा है
मौसमी हवाओं का
फागुन है नाम
मगर जेठ की दोपहरी है।

अब तो इस बियाबान में
पड़ाव ढूंढ रही
मृगतृष्णा की मारी जिंदगी।

॥ॐ॥

*रीतापन*

जैसा कुछ चाहा था,
वैसा तो हुआ नहीं।
शब्दों की भीड़ और हम
जलते संबंध और भ्रम!

चिटका है शीशा क्यों?
हमने तो छुआ नहीं।

जीने को खेंचतान,
कहने को स्वाभिमानी!
आंच बहुत है लेकिन
आसपास धुआं नहीं।

रीतापन अपना है
बाकी सब सपना है।
डूबे हैं जिसमें हम
शायद वह कुआं नहीं।

॥ॐ॥

॥चाहत॥

मुझे,
तुझे,
मनाने का,
और तेरे,
चल रहे सपनों के बागीचे में,
गुलाब उगाने का इरादा,
कतई नहीं है।

मैं तो फकत,
सन्निपात के रोगी की तरह,
इस आस में,
कविताएँ!
बड़बड़ा रहा हूं कि,
शायद किसी चोट से,
तेरे सपने बिखर जांयें,
पतझर की तरह,
और, तू
निर्वस्त्र
पेड़ की तरह!
अखण्डित मौन में खड़ी रह जाये।

और वहां, जहां कि,
सारे शब्द दम तोड़ देते हैं!
गजलें,
कविताएँ, वेद की ऋचाएं
और सभी कुछ,
बेमानी हो जाते हैं।

और
ये प्रयास भी
केवल इसलिए है, कि
मैं
तुझे
बेहद चाहता हूं।

॥ॐ॥

Tuesday, July 1, 2014

सुनामी!

एक दिन सुनामी आएगी,
जिंदगी को बहा ले जाएगी

रेत से सोने के कण
बीन लो,
कोई गीत गा लो,
कोई गजल गुनगुना लो,
किसी की सुन लो,
या अपनी सुना लो।

वर्ना देर हो जाएगी।

।।ॐ।।