Wednesday, July 2, 2014

॥पड़ाव॥

बीत गयी बातों में,
रात वह खयालों की।
हाथ लगी निंदयारी जिंदगी!

आंसू था सिर्फ एक बूंद
मगर जाने क्यों,
भीग गयी है, सारी जिंदगी?

वह भी क्या दिन था!
जब सागर की लहरों ने,
घाट बंधी नावों की
पीठ थपथपाई थी!

जाने क्या जादू था?
मेरे मनुहारों में!
कि
चांदनी
लजाकर इन बांहों में सिमट आई थी!

अब तो गुलदस्ते में,
बाकी कुछ फूल बचे,
और बची रतनारी जिंदगी।

मन के आइने में,
उगते जो चेहरे हैं
हर चेहरे में
उदास हिरनी की आंखें हैं।

आंगन से सरहद को जाती,
पगडंडी की दूबों पर
बिखरी कुछ बगुले की पांखें हैं।
अब तो हर रोज
हादसे?
गुमसुम सुनती है
अपनी यह गांधारी जिंदगी!

जाने क्या हुआ?
नदी पर कोहरे मंडराए
मूक हुई सांकल और
दीवार हुई बहरी है।

बौरों पर पहरा है
मौसमी हवाओं का
फागुन है नाम
मगर जेठ की दोपहरी है।

अब तो इस बियाबान में
पड़ाव ढूंढ रही
मृगतृष्णा की मारी जिंदगी।

॥ॐ॥

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