मुझे,
तुझे,
मनाने का,
और तेरे,
चल रहे सपनों के बागीचे में,
गुलाब उगाने का इरादा,
कतई नहीं है।
मैं तो फकत,
सन्निपात के रोगी की तरह,
इस आस में,
कविताएँ!
बड़बड़ा रहा हूं कि,
शायद किसी चोट से,
तेरे सपने बिखर जांयें,
पतझर की तरह,
और, तू
निर्वस्त्र
पेड़ की तरह!
अखण्डित मौन में खड़ी रह जाये।
और वहां, जहां कि,
सारे शब्द दम तोड़ देते हैं!
गजलें,
कविताएँ, वेद की ऋचाएं
और सभी कुछ,
बेमानी हो जाते हैं।
और
ये प्रयास भी
केवल इसलिए है, कि
मैं
तुझे
बेहद चाहता हूं।
॥ॐ॥
तुझे,
मनाने का,
और तेरे,
चल रहे सपनों के बागीचे में,
गुलाब उगाने का इरादा,
कतई नहीं है।
मैं तो फकत,
सन्निपात के रोगी की तरह,
इस आस में,
कविताएँ!
बड़बड़ा रहा हूं कि,
शायद किसी चोट से,
तेरे सपने बिखर जांयें,
पतझर की तरह,
और, तू
निर्वस्त्र
पेड़ की तरह!
अखण्डित मौन में खड़ी रह जाये।
और वहां, जहां कि,
सारे शब्द दम तोड़ देते हैं!
गजलें,
कविताएँ, वेद की ऋचाएं
और सभी कुछ,
बेमानी हो जाते हैं।
और
ये प्रयास भी
केवल इसलिए है, कि
मैं
तुझे
बेहद चाहता हूं।
॥ॐ॥
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