Thursday, July 3, 2014

॥योगी॥

भरे बाजार, जिसका-
ध्यान सधने लगे,
योगी वही है।

जिंदगी की कशमकस के बीच,
चित्त को विदीर्ण करती,
संसारी अहंकारी गर्जनाएं,
उद्वेगों का फेनिल विकार,
बहता उफनता गंदगी के रूप में,
लगता किनारे--आखरी परिणामों सा।

संसार के तूफान में जो,
होश कायम रख सके,
योगी वही है।

जब कभी,
निर्जन हिमालय से उतर,
आओगे नीचे,
संसारी हवाओं के थपेड़े,
भंग कर देंगे, हिमानी शांति को।

अस्तित्वगत जिंदगी यदि है, तो--
सब कहीं है, एक सी है।
चाहे हों हिमालय की निर्जन गुफाएं,
या तुम्हारे शहर का व्यस्त बाज़ार।

जागरण पर--जब अहं,
स्वप्नवत् निर्मूल्य होगा,
चित्त की झील, तब दर्पण बनेगी,
तब अखण्डित चांद को तुम देख लोगे।

बरसती चांदनी!
फैलता अमरत्व!
झूमते वृक्ष!
प्रकृति में चल रहे,
इस अखण्ड उत्सव से,
तुम कभी भी,
जुदा नहीं हो।
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(dada64)

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