मेरे प्रिय विद्यार्थी,
मुगालते में मत रहना
शिक्षा की परिभाषा-
हर युग में परिशोधित हुई है-
आज की शिक्षा!
छल, फरेब, धोखा, ईष्या, वैमनस्यता,
प्रताड़ना, शोषण, तनाव, कटुता
की कड़ुआहट को,
मीठी और सुंदर भाषा के केप्सूल में
रखके दूसरों का उपचार कर लेने में,
निपुणता का नाम है
हर व्यक्ति आतुर है आज
सुनाने को दास्तां अपनी
निपुणता की।
जानकर खुशी हुई कि
समय नहीं है
तुम्हें भी
किसी को सुनने का
भीड़ बेताब है
कान के पर्दे फट जांय, इतना शोरगुल है!
पर अब
सुनने वाले पैदा ही नहीं हो रहे हैं।
संसद सा दृश्य तो अब-
तुम्हारे मुहल्ले में भी होगा?
मौन होना तो अच्छी बात है
मैं भी मानता हूं।
पर उसमें खतरा भी है-
आसपास का शोरगुल
एक साथ सुनाई देने लगता है।
कान खराब हो जाने का भय भी है।
पर हां!
इस संसदीय संस्कृति के युग में
"मौन पर भाषण"
मुझसे अधिक अच्छा कौन दे सकता है?
'मौन' मेरा सब्जेक्ट रहा है,
उस पर मैं अथारिटी हूं।
तुम्हें कभी अवकाश मिले तो-
मेरी तरफ निकल आना।
...(dada64)
मुगालते में मत रहना
शिक्षा की परिभाषा-
हर युग में परिशोधित हुई है-
आज की शिक्षा!
छल, फरेब, धोखा, ईष्या, वैमनस्यता,
प्रताड़ना, शोषण, तनाव, कटुता
की कड़ुआहट को,
मीठी और सुंदर भाषा के केप्सूल में
रखके दूसरों का उपचार कर लेने में,
निपुणता का नाम है
हर व्यक्ति आतुर है आज
सुनाने को दास्तां अपनी
निपुणता की।
जानकर खुशी हुई कि
समय नहीं है
तुम्हें भी
किसी को सुनने का
भीड़ बेताब है
कान के पर्दे फट जांय, इतना शोरगुल है!
पर अब
सुनने वाले पैदा ही नहीं हो रहे हैं।
संसद सा दृश्य तो अब-
तुम्हारे मुहल्ले में भी होगा?
मौन होना तो अच्छी बात है
मैं भी मानता हूं।
पर उसमें खतरा भी है-
आसपास का शोरगुल
एक साथ सुनाई देने लगता है।
कान खराब हो जाने का भय भी है।
पर हां!
इस संसदीय संस्कृति के युग में
"मौन पर भाषण"
मुझसे अधिक अच्छा कौन दे सकता है?
'मौन' मेरा सब्जेक्ट रहा है,
उस पर मैं अथारिटी हूं।
तुम्हें कभी अवकाश मिले तो-
मेरी तरफ निकल आना।
...(dada64)
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