Thursday, July 3, 2014

'राजनेता' का स्वर्गारोहण!!!

एक बार हुआ ऐसा कि,
एक राजनेता--दिल्ली का,
मरा।
होशियार था,
दुनियादारी के दावपेंच जानता था।
सारी उम्र दिल्ली में गुजारी थी।
घेराव, आंदोलन, सभाएं, टकराहट!
उत्तेजना की लकीरें,
मरने के बाद भी शेष थी।

स्वर्ग या नर्क?
कहां जाना है?
पूछा ईश्वर ने-
नेता बोला--
पहले सैर करवा दो,
जहां मन लग जाएगा, वहीं रह जायेंगे

पहले
स्वर्ग के द्वारपाल को,
नेता जी का गाइड बनाया।

स्वर्ग!!!
सब ध्यानस्थ!
न कोई शोर न कोई उपद्रव,
स्वर्ग की शांति, नेता को
मरघटी सन्नाटे सी चुभी
नेता घबराया
अकबका के द्वारपाल से पूछा--
यहां अखबार निकलते हैं?
विनम्र उत्तर मिला--
जरूरत ही नहीं।
न कोई झगड़ा, न झांसा,
न कोई चोरी, न तमाशा,
न पराई स्त्री को भगा ले जाने का अंदेशा,
मतलब--
यहां छापने की कोई खबर ही नहीं!

राजनेता सकपकाया,
और झपट के, नर्क की ओर कदम बढ़ाया।

नर्क अधिपति शैतान,
स्वयं द्वार तक लेने आया।
पुष्पमाल से स्वागत हुआ।
पश्चात
मदिरा के दौर चले
आक्रेस्टा पर सुंदर बालाओं के नृत्य!!!
नेता को स्वर्ग से लगे!
जैसे नर्क में स्वर्ग का अनुभव हुआ।

नेता ने झूम कर कहा---
माइक लाओ, सभा करो--
पंडित पुरोहितों को बेनकाब करूंगा
इनके बहकावे में लोग भ्रमित हैं।
स्वर्ग को नर्क
और नर्क को स्वर्ग, समझ रहे हैं।
जबकि हालात एकदम उल्टे हैं।

लम्बी नि: श्वांस लेकर शैतान बोला--
क्या करें?
सदियों से,
सारे प्रचार माध्यम, परमात्मा के कब्जे में हैं।
विज्ञापन का जमाना है!
झूठ भी सच हो जाता है।

राजनेता ने साहस बंधाया--
और अपना ठिकाना नर्क ही बनाया।
स्वर्ग के द्वारपाल को बेमुरौवत,
वापिस लौटाया।

द्वारपाल के मुड़ते ही,
और
नर्क का द्वार बंद होते ही,
दृश्य बदल गए--
उत्तप्त बड़े-बड़े कढ़ाहों से
गोस्त के जलने की गंध,
और
कष्टों की पराकाष्ठा से उठते आर्तनादों,
के बीच उभरते, नरकंकालों के अट्टहासों से,
राजनेता कंप गया।
अवरुद्ध कंठ,
बमुश्किल पूछा--
क्या हुआ?
अभी तक तो सब ठीक था?

स्पष्टीकरण ऐसा मिला--
कि वह सब तो टूरिस्टों के लिए था।
क्योंकि,
हर दुख के पेकेट पर,
सुख का लेवल, तो
लगाना ही पड़ता है।
---
...(dada64)

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