Wednesday, July 2, 2014

*रीतापन*

जैसा कुछ चाहा था,
वैसा तो हुआ नहीं।
शब्दों की भीड़ और हम
जलते संबंध और भ्रम!

चिटका है शीशा क्यों?
हमने तो छुआ नहीं।

जीने को खेंचतान,
कहने को स्वाभिमानी!
आंच बहुत है लेकिन
आसपास धुआं नहीं।

रीतापन अपना है
बाकी सब सपना है।
डूबे हैं जिसमें हम
शायद वह कुआं नहीं।

॥ॐ॥

1 comment:

  1. dear Elizabeth,
    Thanks!
    Soon I'm going to write in English too.
    (Love)
    नमस्ते।

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